माता का सबसे ऊंचा मंदिर, 27 वर्षों से जारी निर्माण:राजस्थान में 275 फीट ऊंचा महाकाली-भद्रकाली का मंदिर, 21 मंजिला भवन के ऊपर गुंबद

हनुमानगढ़ में माता का ऐसा मंदिर है, जिसका 27 सालों से निर्माण चल रहा है। कई किलोमीटर दूर से दिखने वाला यह मंदिर 275 फीट ऊंचा है। मंदिर की 21 मंजिला इमारत के ऊपर गुंबद है। माघ मास में आने वाले गुप्त नवरात्र का आज छठा दिन है। हम बात कर रहे हैं संगरिया कस्बे में बने महाकाली-भद्रकाली माता के मंदिर की।

खास बात यह कि मंदिर बनाने की शुरुआत करने वाले बाबा शीतलदास मौन रहते हैं, किसी से बात नहीं करते। न ही मंदिर निर्माण के लिए किसी से सहयोग मांगा था। इसके बावजूद श्रद्धालुओं ने खुद आगे आकर मंदिर का निर्माण करवाया।

मंदिर निर्माण कर्ता संस्थापक एवं संचालनकर्ता श्रीश्री 1008 बाबा सेवादास के शिष्य श्रीश्री 108 मौनी बाबा शीतलदास उदासीन निर्वाण श्री पंचायती अखाड़ा बोलते नहीं हैं। अपने श्रद्धालुओं के माध्यम से बाबा बताते हैं कि यह मंदिर विश्व का पहला मंदिर है, जो सबसे ऊंचा है।

मंदिर में माता भद्रकाली और महाकाली दोनों की प्रतिमाएं विराजमान है। माता भद्रकाली- महाकाली माता के साथ श्री काल भैरव सिद्धपीठ का प्राचीन मंदिर और श्री श्री 1008 बाबा सेवादास उदासीन निर्वाण श्री पंचायती अखाड़ा बड़ा ब्रहालीन का गुरु मंदिर (समाधि) भी स्थापित है।

मंदिर में हैं कई देवी-देवताओं की प्रतिमाएं
मां महाकाली व भद्रकाली मंदिर के गुंबद की ऊंचाई अधिक होने के कारण संगरिया में आने जाने वाले और गुजरने वाले लोगों को दूर से ही आकर्षित करता है। मंदिर के अंदर भगवान कृष्ण-राधा, शिव पार्वती, हनुमान जी के साथ-साथ देवी-देवता और ऋषि मुनियों की प्रतिमा स्थापित है। मंदिर में आने वाले भक्तों के सहयोग से यह मंदिर बना है।

खास बात यह है कि इसके निर्माण कार्य में अभी तक किसी से कोई सहयोग नही मांगा गया, लेकिन सभी भक्तों ने अपनी इच्छा के अनुसार निर्माण सामग्री का योगदान दिया है। मंदिर के इतनी ऊंचाई पर स्थापित होने के कारण जो भी बाहर से आता है वह मंदिर में जरूर दर्शन करने आता है।

माता भद्रकाली- महाकाली के मंदिर के निर्माण कार्य 24 जनवरी 1995 में शुरू किया गया। 22 मार्च 2012 को महाकाली माता की मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा की गई। श्री काल भैरवनाथ भगवान के मंदिर की नींव 7अप्रैल 1992 काे रखी गई। उसके बाद करीब 9 वर्ष तक निर्माण कार्य चला। निर्माण कार्य पूर्ण होने के बाद श्री काल भैरवनाथ भगवान की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा 11 नवंबर 2000 हुई। खास बात यह है कि मंदिर में निर्माण कार्य अब भी जारी है।

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